
सनातन में ही धाराएं बंट चली हैं ।
अपने ही महापुरुषों पर कीच उछाल रहे हैं
स्वार्थ की आंधी वो चली
अपने ही देश-धर्म में
फूट के सपन पाल रहे हैं
अलग राह बना रहे हैं
कितनी तुम राहें बनाओं गे
कब तक अपनी अस्मिता पे लांछन लगाओगे
कितने ही खण्ड इसके बनाओगे।
बाहरी लोग देखें तमाशा
काटने को जड
अपनों ने ही फिर से कुल्हाड़ी को तराशा।
इस बार बाहरी भी नहीं हैं
जिन पर हमें रहा है गर्व
स्वार्थ के वशीभूत सभी …. किस से करें हम आशा।
आसुरी प्रवृत्तियों को
हम ने अपने मनो में पाला ।
जिन के साथ कुछ कहने की शक्ति
बुद्धि में धर्म नहीं …. वहां धर्म से पैदा हुई विरक्ति
एकता के सूत्र मनके बिखर न जाएं
चहुं दिशा खड़े हैं चोर उचक्के
वे फिर से झपटे की ताक लगाएं
तुम्हारे मोती चुग ने जाएं।
भोलेनाथ से करूं विनय–
हे ! महादेव तेरी सृष्टि बचे, गहराया महाकाल।
आदि सनातन संस्कृति घिरी स्वार्थ मायाजाल।
आ रहा वर्ष– ‘रौद्र संवत्सर’ परम विकाराल।
गुरु हो राजा विकट स्थिति की करे संभाल।
महेश शर्मा, करनाल













