
।। साधना पथ ।।
३. मणिपूर चक्र
Epigastric Plexus
चक्र स्थान– इसे नाभि चक्र भी कहते हैं । नाभि मूल, नाभि से थोड़ा ऊपर स्थित है । यह शरीर का केंद्रीय स्थल है, जहां से भीतिक ऊर्जा का वितरण कार्य होता है । यह नाभि केन्द्र तथा उसी के पीछे रीढ़ खम्भ के भीतर होती है । नाभि के पीछे मेरूदंड में इसकी स्थिति माननी चाहिए ।।
केन्द्र– शारीरिक और मानसिक शक्तियों का मूल स्थल, यह चक्र एड्रेनल ग्लैंड से संबंधित है । यह पेट, लीवर तथा गॉलब्लैडर से जुड़ा हुआ है । यह प्राण ऊर्जा का भंडार घर है ।।
तत्त्व बीज– रं
गुण– रूप
संबंधित अंग– आमाशय, यकृत, पित्ताशय तथा पाचन संस्थान के अंग ।।
मंत्र की ब्याहति–
ओ३म् जनः।।
शक्ति का नाम– जन शक्ति ।
तत्त्व स्थान– रक्त रंग त्रिकोणाकार वाले अग्नि तत्त्व का मुख्य स्थान है । जिस प्रकार मेढ़ा ऊपर को उछलकर चलता है, इसी प्रकार इस तत्त्व की गति ऊपर की ओर है ।।
दलों के अक्षर–
दस पंखुडियाँ दलों पर — डं, ढं, णं, तं, थं, दं, घं, नं, पं, फं ये दस अक्षर हैं ।।
वायु स्थान– समान वायु का मुख्य स्थान है ।
लोक– स्वः
अधिपति देवता– इंद्र
इसे लक्ष्मी का निवास भी माना गया है ।
यंत्र– त्रिकोणाकार,
रंग– रक्त
ज्ञानेंद्रिय– देखने की शक्ति चक्षु का स्थान है। कर्मेंद्रिय चलने की शक्ति पैर का स्थान है ।।
☀तिब्बत में ‘Om Mani Padme Hum’ मंत्र तथा इससे संबंधित मंत्रों द्वारा चक्र पर ध्यान करने का फल ।।
यह चक्र निम्न अंगों को सक्रिय तथा अनुशासित करता है–
१. डायफ्राम ।
२. लीवर ।
३. पेंक्रियाज ।
४. पेट ।
५. बड़ी ओर छोटी आँतें ।
६. एड्रेनल ग्लैंड, हृदय, फेफड़ों का निचला भाग ।
७. यह लीवर के माध्यम से रक्त शुद्धि का कार्य करता है ।
८. शरीर के तापक्रम को नियंत्रित रखता है ।
९. यह अन्य चक्रों को भी प्रभावित करता है ।
☀चक्र के विकारग्रस्त होने से हानियाँ —
इसके अस्वस्थ अथवा निष्क्रिय होने पर निम्न रोग हो जाते हैं ।।
१. श्वास लेने में कठिनाई ।
२. डायबिटीज ।
३. पचन-संबंधी रोग ।
४. पैनक्रियाज संबंधी रोग ।
५. हेपटाइटिस ।
६. गालब्लैडर संबंधी बीमारियाँ ।
७. रक्त संबंधी रोग ।
८. हृदय संबंधी बीमारियाँ ।
९. अन्य मानसिक रोगों का संबंध भी इसी चक्र से होता है। यह नकारात्मक और सकारात्मक, दोनों निम्न स्तर के भावों का, जैसे भय, क्रोध, घृणा, लोभ, हिंसा आदि का प्रमुख केंद्र है। मानसिक रोगों के उपचार में इस केन्द्र का विशेष महत्त्व है ।।
नोट: जन: शक्ति कंटकूप में भी होती है। इसका कार्य व्यक्ति को शक्ति और बुद्धिमत्ता प्रदान करना है। हम आवेश एवं संवेदना इसी चक्र से प्राप्त करते हैं। इस चक्र के दो
भाग हैं ।।
दायें भाग में भौतिक उपलब्धियाँ, विचारों की स्पष्टता एवं तर्क-वितर्क की क्षमताएं करने की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है।
वायें स्वाधिष्ठान चक्र के दुर्बल होने से व्यक्ति बाह्य कीटाणुओं का
शिकार बन जाता है । इस चक्र पर ध्यान का फल शरीर व्यूह का ज्ञान है । इस पर ध्यान करने से अजीर्ण दूर होता है ।।
हरिकृपा ।।
संकलन व प्रेषण–
पं. बलराम शरण शुक्ल हरिद्वार ।।











