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गर्मी की इस तपिश में,

गर्मी की इस तपिश में,
मानो हर कोई जलता है।

आशियाने से निकलने से,
मानो हर कोई डरता है।

श्रष्टि की ये जो रचना है,
यह प्राकृति उसका गहना है।

प्राकृति जब संतुलन दिखलाती है,
तपती धूप में तब हरियाली लहराती है।

जरा सोचो……..
सूरज की ये गर्म तपिश,
कभी इन्हे लगती नहीं?
क्या तुम्हें कभी लगता नहीं,
ये मौन है निः शब्द नहीं।
जरा सोचो………

कैसा रिश्ता है सूरज और हरियाली का।
सूरज जलकर भी श्रष्टि के,
संचालन का भार उठाता है।
लेकिन……..

प्राकृति की ये हरियाली,
क्या कभी जलती नहीं?
पर शायद ये जलने का कष्ट समझती है।
इसीलिए धरती के जीवों को,
हर पल ठंडक देती है।

श्रीमती सुनीता बोपचे, सिवनी (म प्र)

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