
लेकर आता सुनहरी धूप संग,
सातों रंगों का मेला,
मिटाने रात्रि की कालिमा…
सजाने सवाँरने सभी के सपनों को…
जीवन देती रुपहली किरणें,
छन कर रौशनदान से,
जब पड़ती चेहरे पर,
दे जाती नई स्फूर्ति नई ताजगी
रात में नींद में देखे
सपनों को पूरा करने की,
सूरजमुखी सा रस्ता देखता है हर कोई
खिलाने मन की कलियाँ,
कभी कभी जलाता भी है
अपनी तपिश से,
सजाने मेहनतकश लोगों
के चेहरों को
पसीने के झिलमिलाते मोतियों से,
और ढलते ढलते साँझ को देता
फिर से वही सुनहरी धूप,
पर्वतों के पीछे से छनकर आती
किसी दैवीय मुकुट सा आभास कराती,
और अंत में
थककर दिनके सफर से,
खुद अपनी ही तपन से झुलसे,
मन को सौंप देता है…
चाँद की शीतलता के आगोश में,..
उगने से लेकर तपने तक…
तपने से लेकर शीतल होने तक…
दे जाता है सारी दुनिया को संदेश,
उगो, बढो़,एक स्वर्णिम आभा लिये,
तपाकर जीवन को
गढ़ लो अमिट अक्षरों में,
अपने जीवन के जेवर को,
ढ़लते हुये भी हो वही स्वर्णिम आभा,
किसी का पथ सँवारने की….
उगो तो सूरज से,
जियो तो सूरज से,
और ढलो भी तो सूरज सा ही
फिर उग आने का विश्वास लिये….
माला अज्ञात…..













