Uncategorized
Trending

अविरल-प्रेम-प्रवाह

हे ! सजन लौट के आ जाओ इस पार‌।
सारी-सारी रात बहे आंसुओं की धार।

सजन क्यूं चले गए उस घड़ी उस पार।
तिर न पाऊं जग में उफनती मझधार।
कड़कती बिजलियां में डरूं मैं बार-बार।
जग अंधकार, घड़ी-घड़ी वक्त की मार।

हे ! सजन लौट के आ जाओ इस पार।
सारी-सारी रात बहे आंसुओं की धार।

         हे ! सजनी चाहे मैं मील हज़ारों हजार।
         कर ले तूं इंतज़ार अब बचे हैं दिन चार।
         रहा न जाए बिन तेरे, हूं तेरा तलबगार।
         मेरी धरा सदाबहार, दिल का ये करार।

हे ! सजन लौट के आ जाओ इस पार।
सारी-सारी रात बहे आंसुओं की धार।

जग वैरी,जीने का कोई न रहा आधार।
विरह वेदना में कब तक करू इंतजार।
देखे थे जो सपने कब होंगे वो साकार।
नैन तरसे, कब आओगे प्रिय इस पार।

हे ! सजन लौट के आ जाओ इस पार।
सारी-सारी रात बहे आंसुओं की धार।

          तेरा संग पाने को, मेरा  जिया बेकरार।
          हे ! सजनी तूं  मेहरारू मैं तेरा भरतार।
          इस जग तूं है,  है रब पर  मुझे ऐतबार।
          वो खुशनसीब बहे जिया गंगा की धार‌।

आओ मिल गाएं मिला प्यार को प्यार।
दिलों में बहेगी ये अविरल गंग की धार।

                        -- महेश शर्मा, करनाल

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *