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मनुष्य और मुखौटे


मनुष्य, मनुष्य के लिए जिए
मनुष्य मनुष्य के लिए मरे
वह जीवन क्या है जो
खुद ही खुद के लिए जिए

वन्य जीव खुद के लिए जीते हैं जीवन के लिए दूसरों को मारते हैं हम मानव हैं दानव नहीं जियो जीने दो में विश्वास करते हैं

हम तो मनु संतान हैं
करें दधिचि सा देहदान
आप धनवान आपके
बंगले है कारें जहांन है

यह सब मुखोटे हैं
जो आपने ओढे हैं
ओढ़ें मानवता की चादर
पर यह काम टेढे हैं

मानवता यज्ञ में
जुड़े सभी सर्वज्ञ
यही सच्ची ईश्वर सेवा है
विनती करें सर्व जन विज्ञ
राम वल्लभ गुप्त इंदौरी

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