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ज्ञान मंदिर

विधा – लघु कथा

प्रोफेसर दीनानाथ जी बैठे अखबार पढ़ रहे थे तभी ख़त आया। डाकिये से खत मिलने के बाद जब खोला तो होश ही उड़ गए। कितने सालों बाद उसी कोलेज में उन्हें मुख्य अतिथि बनकर जाने का मौका मिला था जहां वे लाइब्रेरी में थे। वहीं पढ़कर तो उन्होंने स्नातकोत्तर प्राप्त किया था, उनकी खुशी का ठिकाना न था।
बड़े अरमानों से वे चल पड़े दूसरे ही दिन अपनी मंजिल की ओर सोचा फिर सबसे मिलना होगा हँसी मजाक होगा।
“अपनी जगह देखना तो बनता है कि आज वहां कौन बैठा है। खुद का उदाहरण उस नव जवान के समक्ष रखूँगा।”, सोचते हुए रास्ता निकल गया और पहुँचे अपने पुराने कोलेज।
गाड़ी से उतरते ही देखा सभी स्वागत में खड़े थे कोई फूल तो कोई हार लेकर। सभी पहुँचे उद्घाटन के स्थान पर वहाँ एक स्पोर्ट्स कोम्प्लेक्स का फीता काटा खूब वाहवाही हुई और तालियां बटोरी, ऐसी अनुभूति जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है।
पास ही उनका पुस्तकालय था। मन किया, “ज़रा देख आऊं..”।
पहली फुरसत मिलते ही प्रोफेसर साहब उस ओर चल पड़े। जैसे ही पहुँचे आँखें फटी की फटी रह गई। और सोच में पड़ गया,
“ये क्या…. मेरी लाइब्रेरी का यह हाल, काश… कि कोई ऐसी कैंची मिल जाए कि जिससे इसमें लगे जाले मैं काट सकूँ। कुछ लोग मेरे समर्थन में खड़े हों जो मुझे इस काम के लिए हिंमत बढ़ा रहे हों और इन पुस्तकों पर पड़ी धूल को हम सब मिलकर झाड़ते। काश कि यह सन्नाटा तालियों की गूँज से भर जाता। इस मंदिर का जिर्णोद्धार भी तो आवश्यक है।”

सादर प्रणाम
दीपिका किशोरी ‘चांँदनी’

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