
यह धरती संपूर्ण ब्रह्मांड की रचना अनुपम।
इसमें रहते हैं सब जीव जंतु तुम और हम।।
जिस अंचल में अपना है सुंदर सुखमय जीवन।
उस आंचल में फैलाओ ना कभी प्रदूषण।।
काट कर पेड़ हरा भरा करो ना चीर हरण ।
इधर-उधर धुआं धुआं क्या यही है नील गगन ?
जल थल नभ दुषित कहां नदिया का निर्मल जल?
मां की इस दशा पर मन में नहीं क्यों हलचल?
उजड़ रहे हैं खेत खार सिमट रही हरियाली ।
यह सब कर क्या निज पैरों नहीं मार रहे कुल्हाड़ी ??
अब भी वक्त संभलो इसे हरा भरा रहने दो ।
ना करो कचरा इसे बाधा रहित सांस लेने दो ।।
विकास हो उतना ही विनाश से हम बच जाए।
सुंदर हो या जीवन अपने ही कुएं डूब ना मर जाए ?
कृष्ण कुमार साहू दीपका जिला कोरबा छत्तीसगढ़













