
किनारे के मुसाफ़िर का मुस्तकबिल बताए है
राहे अनजानी सी पर मंजिल कही छिपाए है।।
हैरत है सफ़र के दौर कई शामिल है
राहे बेमानी सी और राह न हासिल है।।
कतरो मे बुझती हुई हलक की प्यास भी
सुकून नही तृप्ति की अंत की आस भी।।
दरकते वक्त की मार भी काबिज है
बेशुमार हसरतें और नफ़रत सी कातिल है।।
किरदार निपट नकाब मे शख्सियत नदारद है
फसल शायद रकीब सी जो कही गैर हाज़िर है।।
मुद्दा कोई यह नही कि मंजिल न आम है
सफ़र ही कुछ ऐसा है कि हर कोई परेशान है।।
तूफ़ान के पहले की लगती कोई ख़ामोशी है
सरल जरा ध्यान दे पनघट की आगोशी हैं।।
संदीप शर्मा सरल।।
देहरादून उत्तराखंड ।।













