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स्वयं की पहचान

मैं किसी की पसंदीदा नहीं, अब बनना भी नहीं चाहता,
झूठी चाहत की भीड़ में, खुद को नहीं खोना चाहता।

ज़रूरतों के तराजू पर, अक्सर तोला गया हूँ मैं,
दिल की सच्ची धड़कनों से, कम ही खोला गया हूँ मैं।

अब फर्क नहीं पड़ता, कौन क्या कह जाता है,
कौन मुझे क्या समझे, मन सब जान जाता है।

मुझे खुद को जानने का, पूरा अधिकार मिला,
भीड़ में खोया जो था, अब खुद से ही प्यार मिला।

मैं किसी को जज नहीं करता, सब अपने जैसे हैं,
कोई पास आए तो अच्छा, वरना भी सब वैसे हैं।

बात करे कोई मुझसे, तो हँसकर मिल लेता हूँ,
न करे तो चुप रहकर, खुद में ही खिल लेता हूँ।

अकेलापन अब बोझ नहीं, ये मेरी ताकत है,
भीतर की इस खामोशी में, जीवन की राहत है।

जो मैं हूँ, वो दुनिया ने अब तक नहीं जाना,
चेहरे के पीछे छुपा, असली रूप पहचाना।

अगर कोई सच में जाने, तो वो मैं खुद ही हूँ,
अपने ही एहसासों का, अब मैं ही साक्षी हूँ।

बाकी सबने समझा उतना, जितनी उनकी ज़रूरत थी,
मेरे होने की कीमत बस, उनकी अपनी आदत थी।

अब मैं खुद में पूरा हूँ, ये एहसास सजाया है,
स्वयं की इस पहचान ने, जीवन को अपनाया है।

रचनाकार
कौशल
मुड़पार चु,पोस्ट रसौटा तहसील पामगढ़ जिला जांजगीर चांपा छत्तीसगढ़

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