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वीर कुँवर सिंह का रणगर्जन

गरजा रण में सिंह समान, कुँवर वीर बलवान,
अंग्रेजों के दल थर्राए, सुन उसका हुंकार।

अस्सी वर्ष की देह मगर, ज्वाला थी प्रचंड,
स्वाधीनता हित उठ खड़ा, बनकर अग्निकुंड।

सत्तावन के रण में उठकर, क्रांति बिगुल बजाया,
हर सैनिक के मन में ,स्वाधीनता दीप जलाया।

जगदीशपुर की धरती बोली, “मेरा वीर महान”,
जिसने मातृभूमि हेतु, किया जीवन बलिदान।

तोपों की गर्जन के आगे, न झुका उसका शीश,
रण में कूद पड़ा वह जैसे, बिजली लेकर खींच।

घायल भुजा हुई जब उसकी, तनिक न डोला मन,
गंगा को अर्पित कर दी, निभाया वीर व्रत धन।

दुश्मन दल के बीच खड़ा, बनकर काल प्रहार,
एक-एक कर ध्वस्त किए, सब अत्याचारी द्वार।

धूल चटा दी फिरंगी को, दिखलाया स्वाभिमान,
भारत माँ की लाज रखी, बढ़ाया उसका मान।

वीर रस की वह अमिट कथा, गूंजे बारम्बार,
कुँवर सिंह के नाम से, होता देश उद्गार।

नमन तुम्हें हे रणधीर, शौर्य तुम्हारा धाम,
अमर रहेगा युगों-युगों तक, भारत में तेरा नाम।


डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार

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