
सितम मौसम का कहर बन फट रहा है
मनुष्य पशु पक्षी सभी का दम निकल रहा है
जल ही अमृत है जलदान से परहेज़ ना करना
मौसम के इस उन्माद से इन निर्बोध निश्चल प्राणियों की सदैव रक्षा करना
मौसम का प्रकोप है सर्वत्र ही छा रहा है
सितम मौसम का कहर बन फट रहा है
जल जंगल जमीन पहाड़ सब मानवीय महत्वाकांक्षा की बलि चढ़ गये
बढ़ती विकराल आबादी का दंश धरती ही निगल गये
मौसम कैसे पनपे शैतान के रूप मे इंसान ही पनप गये
प्रकृति से पनपे प्रकृति से ही खेल गये
मौसम की मार है सितम बन टूट रहा है बेमौत इंसान मर रहा है
सितम मौसम का कहर बन फट रहा है
आधारभुत विकास प्राकृतिक विनाश का कारण बन गया
कंकड़ धूल मिट्टी अब गये दौर की किवदंती हो गया
कृत्रिम जीवन शैली एक फेशन बन गया
हवा पानी की जगह इंसान अब बारुद केमिकल अंदर कर रहा है
इंसान की धरा इंसान का ही काल बन रहा है
सितम मौसम का कहर बन फट रहा है
स्वरचित एवं मौलिक
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र










