
आलेखः प्रस्तावना: हवा, पानी, जंगल, खनिज, मिट्टी—ये सब प्रकृति के उपहार हैं। पर पिछले 100 साल में इंसान ने इन्हें इस तरह नोचा है मानो कल दुनिया खत्म हो जाएगी। UN की रिपोर्ट कहती है—1970 से आज तक इंसान ने धरती से 3 गुना ज़्यादा संसाधन निकाले। नतीजा? जलवायु संकट, बाढ़-सूखा, बीमारियाँ। ‘अति दोहन’ यानी ज़रूरत से ज़्यादा, बिना भरपाई के इस्तेमाल करना। यह आलेख इसी अंधी दौड़ और उससे उपजी चुनौतियों पर है।
क्या है प्राकृतिक संसाधनों का अति दोहन?
जब हम संसाधनों को उनकी ‘पुनर्जनन-क्षमता’ से तेज़ गति से इस्तेमाल करते हैं, तो उसे अति दोहन कहते हैं।
उदाहरण: एक पेड़ 20 साल में बड़ा होता है, पर हम 20 मिनट में काट देते हैं। भूजल 1000 साल में रीचार्ज होता है, पर हम 1 साल में ट्यूबवेल से खींच लेते हैं।
अति दोहन के मुख्य क्षेत्र
संसाधन- अति दोहन का तरीका भारत में स्थिति
जल-भूजल का अंधाधुंध दोहन, नदी-दोहन भारत दुनिया का सबसे बड़ा भूजल-उपयोगकर्ता राष्ट्र है। पंजाब-हरियाणा में 78% ब्लॉक ‘Over-exploited’
वन- लकड़ी, खनन, खेती के लिए कटाई 1950 में 40% वन-क्षेत्र, आज 21.7%। हर साल 1.5 लाख हेक्टेयर जंगल साफ़ हो रहे है। मिट्टी-रासायनिक खाद, मोनोक्रॉप, कटाव 30% भूमि बंजर होने की कगार पर खडी़ है। 1 सेमी मिट्टी बनने में 500 साल लगते हैं
खनिज-कोयला, लोहा, रेत का अवैध खनन का खतरा बढता जा रहा है। झारखंड-ओडिशा में कोयला, केरल-तमिलनाडु में रेत-माफिया का लगातार विस्तार हो रहा है।
जैव-विविधता- शिकार, समुद्री-मछली का ओवरफिशिंग 1 लाख प्रजातियाँ विलुप्ति के कगार पर खडी़ है। बंगाल टाइगर मात्र 3000 शेष बचे है।
जीवाश्म ईंधनतेल-कोयला-गैस का अंधा इस्तेमाल भारत का 70% बिजली कोयले से। CO2 उत्सर्जन दुनिया में तीसरे नंबर पर है़।
अति दोहन से उत्पन्न 8 बड़ी चुनौतियाँः
जलवायु परिवर्तन- जंगल कटे तो CO2 सोखेगा कौन? तापमान बढ़ा, ग्लेशियर पिघले। 2023 सबसे गर्म साल रिकॉर्ड हुआ।
जल-संकट: चेन्नई, बेंगलुरु, दिल्ली में ‘Day Zero’ का खतरा। भूजल स्तर 10 साल में 20 मीटर नीचे।
खाद्य-सुरक्षा: मिट्टी की उर्वरता घटी। पंजाब में धान-गेहूँ चक्र से 1 फीट टॉप-सॉइल गायब। 2050 तक 50 करोड़ लोग कुपोषित हो सकते हैं।
प्राकृतिक आपदा: जंगल कटे तो भूस्खलन, बाढ़ की संभावनाऐ बढती जायेगी। 2013 केदारनाथ, 2023 हिमाचल त्रासदी—सबके पीछे एक ही कारण है अति दोहन।
स्वास्थ्य संकट: वायु-प्रदूषण से दिल्ली में उम्र 10 साल कम हो चुकी है। प्लास्टिक-प्रदूषण से माइक्रोप्लास्टिक हमारे खून में बढ रही है।
आर्थिक नुकसान: विश्व बैंक—अगर ऐसे ही चला तो 2050 तक भारत की GDP को 6% का झटका लगने की प्रबल संभावना है।
सामाजिक संघर्ष: पानी, जंगल, ज़मीन के लिए नक्सलवाद, किसान-आदिवासी आंदोलन। ‘नर्मदा बचाओ’ से ‘चिपको’ तक सब उदाहरण हमारे सामने उपस्थित है।
भविष्य की पीढ़ी से चोरी: हम अपने बच्चों का हिस्सा आज खर्च कर रहे हैं। गांधी जी कहते थे—“धरती सबकी ज़रूरत पूरी कर सकती है, लालच नहीं।”
अति दोहन क्यों होता है? 4 मूल कारणः जनसंख्या-दबाव- 140 करोड़ लोग और सीमित संसाधन होना।
उपभोक्तावाद- ‘Use & Throw’ की संस्कृति। एक जींस बनाने में 10,000 लीटर पानी बर्बाद होता है।
नीतिगत कमी: GDP बढ़ाने की होड़ में पर्यावरण-कानून कमज़ोर किए जा रहे है। EIA 2020 ड्राफ्ट इसका उदाहरण है।
जागरूकता की कमी: ‘पेड़ लगाना’ पुण्य, पर ‘पेड़ बचाना’ ज़िम्मेदारी—ये भाव नहीं।
समाधान: 5R से ‘सर्कुलर इकोनॉमी’ तक
Refuse + Reduce: ज़रूरत न हो तो मना करो। प्लास्टिक, फालतू पानी, बिजली घटाओ।
Reuse + Recycle: कचरे से खाद, फ्लाई-ऐश से ईंट, वेस्ट-वॉटर से सिंचाई। स्वीडन 99% कचरा रीसाइकल करता है।
Recharg: जल-संरक्षण। ‘Catch the Rain’ अभियान, खेत-तालाब, रूफटॉप हार्वेस्टिंग। अटल भूजल योजना। नीति एंव तकनीक: ‘Net Zero 2070’ का लक्ष्य। सोलर-पवन ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन, इलेक्ट्रिक वाहन। CAMPA फंड से वनीकरण। जन-भागीदारी: PESA, वन-अधिकार कानून से आदिवासी को जंगल का मालिकाना हक प्रदान करना। ‘एक पेड़ माँ के नाम’ जैसा अभियान। स्कूल में पर्यावरण शिक्षा अनिवार्य हो एंव पर्यावरण संरक्षण कार्य निरंतर जारी रहे।
निष्कर्ष: प्रकृति से ‘ब्याज’ लो, ‘मूलधन’ कभी नहीं।
प्रकृति बैंक है। पेड़, नदी, मिट्टी—ये ‘मूलधन’ हैं। फल, ऑक्सीजन, अनाज—ये सब ‘ब्याज’ है। समझदार आदमी ब्याज खाता है, मूलधन को संभालता है। हम मूलधन ही खा रहे हैं।
याद रखो—डायनासोर इसलिए मिटे क्योंकि वे बदल न सके। इंसान इसलिए मिटेगा क्योंकि वह बदलना ही नहीं चाहता। चुनाव हमारा है कि—‘अति दोहन’ करके 50 साल राज करना है, या ‘सतत् दोहन’ करके हमें 5000 साल जीना है।
“हम धरती के मालिक नहीं, रखवाले हैं। अगली पीढ़ी से इसे उधार लेकर आए हैं इसे संवर्धित करके पुनः लोटानी है।”
मुन्ना राम मेघवाल ।
कोलिया,डीडवाना,राजस्थान।










