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गीत

प्रिय, मेरे इधर भी आ जाना।
नजरों से नजर मिला जाना।।
दुनियां की बातें छोड़ तुम,
बस मुझको दरस दिखा जाना।।
प्रिय मेरे इधर


खामोश शीतल रातों में,
जब चांद का फेरा हो।
बस्ती बस्ती शहर शहर में,
लगा सृजन का डेरा हो।।
ले कलम इतना लिख देना,
मीत मेरे इधर भी आ जाना।
प्रिय मेरे इधर…….


प्रभात की स्वर्णिम किरने,
नित नूतन संदेशा देती हैं।
चाहत हो जिस जिसके दिल में,
उसको उस तक पहुंचाती हैं।।
तुम मिलने की कोशिश करना,
ये मन उपवन खिला जाना।
प्रिय मेरे इधर ……


मेरे इस प्रेम समर्पण को,
नजरों से ही समझ जाना।
शब्द बहुत कम लगते मुझको,
मेरे भावो की तहतक जाना।।
जब कहे दिल तेरा आ जाना,
एक मीठा सपन सजा जाना।
प्रिय मेरे इधर …….


चाह नहीं है धन वैभव की,
प्रेम की कामना है मुझको।
दुनियां से तुझको छिपा लूं,
नही और देख सके तुझको।।
प्रेम का समर्थन कर जाना,
मुझको ना अब आजमांना।
प्रिय मेरे इधर …….


गीतकार मनोहर सिंह चौहान मधुकर

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