
किसी को माफ़ किया जाता है,
पर विश्वास नहीं किया जाता है,
उसे और उसका व्योहार भूलकर,
जीवन में आगे बढ़ जाया जाता है।
आलोचना और प्रशंसा दोनों ही,
आलोच्य के हित में ही होती हैं,
आलोचनाओं से सुधार होता है,
प्रशंसा से प्राय: उत्साह बढ़ता है।
वैसे भी शिकायत कम, शुक्रिया
अधिक करने से दिलों के रिश्ते,
बड़ी ही आसानी से सुधर जाते हैं,
रिश्तों के भाव मधुर हो जाते हैं।
कथन ये कि सबसे ज्यादा सुलझे
हुए दिखने वाले लोग अपने अंदर
अथाह उलझनें लिए हुए होते हैं,
तीक्ष्ण व्यंग्य सत्य समेटे हुये है।
उलझने जिसके पास होती हैं,
उसे ही सुलझाना भी पड़ता है,
आदित्य उलझने सुलझाने वाला
शख़्स सुलझा हुआ कहलाता है।
डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ













