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मोह

मोह मन का सूक्ष्म जाल है,
मोह ही जीवन का बवाल है।
मोह सच्चाई से दूर करता है,
मोह ही दु:ख का कारण है।

मोह में “मेरा” भाव जागता है,
मोह हर रिश्ते को बांधता है।
मोह से ही अपेक्षा बढ़ती है,
मोह से ही पीड़ा चढ़ती है।

मोह में सुख का भ्रम होता,
मोह में मन भ्रमित ही होता।
मोह टिकता नहीं समय में,
मोह बदलता हर क्षण में।

मोह अदृश्य सा बंधन है,
मोह ही मन का कारण है।
मोह न दिखे, न ही छू पाएं,
मोह फिर भी मन को भाए।

मोह में अपना कुछ नहीं,
मोह में सत्य दिखता नहीं।
मोह सब कुछ छीन लेता,
मोह अंत में शून्य ही देता।

मोह से जन्मे भय अनेक,
मोह करे मन को अशक्त।
मोह से चिंता नित बढ़ती है,
मोह शांति को दूर होती है।

मोह में संबंध उलझ जाते,
मोह में सत्य छिप ही जाते।
मोह जितना गहरा होता,
मोह उतना दु:ख ही देता।

मोह से क्रोध भी उपजता,
मोह से लोभ भी बढ़ता।
मोह मन को जकड़ ही लेता,
मोह विवेक को हर लेता।

मोह का अंत समझ में आए,
मोह स्वयं ही टूटता जाए।
मोह जब ज्ञान से टकराए,
मोह धीरे-धीरे मिट जाए।

मोह से ऊपर उठना होगा,
मोह को सच में जानना होगा।
मोह त्याग कर जो जीता है,
मोह से मुक्त वही हो पाता है।

योगेश गहतोड़ी “यश”

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