
अच्छा सिला दिया मेरी वफाओं का
क्या रंग दिखाया इतने सालों की मेहनत का
कर दिया बदनाम मेरी तपस्या को
पर तुझे देर न लगी मेरे चरित्र पर उंगली उठाने में
सुख दुःख को तेरे साथ रहीं थीं
कदम से कदम मिलाकर साथ चली थी
तिनका-तिनका जोड़ कर घर-बार संजो रही थी
पर तुझे देर न लगी मेरे चरित्र पर उंगली उठाने में
हर रिश्ते को मान सम्मान दिया था
बड़े प्यार से उन्हें सीचा था
बच्चें की तरह मां बाप को संभाला था
पर तुझे देर न लगी मेरे चरित्र पर उंगली उठाने में
तेरी हर बात को माना था
दिन को भी रात जाना था
दिल में दर्द छुपा संग तेरे मुस्कुराईं थी
पर तुझे देर न लगी मेरे चरित्र पर उंगली उठाने में
सपनों को अपने तोड़ा था
खुद के पैरों तले रौंदा था
तेरे ख्वाबों को अपना बनाया था
पर तुझे देर न लगी मेरे चरित्र पर उंगली उठाने में
सब कुछ बर्दाश्त कर सकती हूं
तेरे लिए कुछ भी कर सकती हूं
उंगली कोई उठाये चरित्र पर मेरे सह नहीं सकती हूं
किसी ओर की तो बात ही क्या कहूं
तुझे ही देर न लगी मेरे चरित्र पर उंगली उठाने में
स्वाभिमान को छोड़ तो अब कहां जाऊंगी
तिरस्कार जो मेरा किया बर्दाश्त कर ना पाऊंगी
सीता तो मैं नहीं जो धरती में समां जाऊंगी
छोड़ शहर चली गयी तो सच्चा तू बन जायेगा
मर गई तो तब सुकून मुझे आयेगा
पर तुझे देर न लगी मेरे चरित्र पर उंगली उठाने में
प्रिया काम्बोज प्रिया
सहारनपुर उत्तर प्रदेश













