
विषय- उम्र
विधा- कविता
अब मैं उम्र के उस मोड़ पर हूँ कि फिर से एक बच्ची बन जाना चाहती हूँ।
वो बचपन की अल्हड़ नादानियों को, मैं फिर से जीना चाहती हूँ।
कभी जिद करने और रोकर मनवाने को, मैं फिर तैयार
हो जाना चाहती हूँ।
पिता से जिद मनवाने और,
माँ से रूठ जाने को।
झलक इनकी अब बच्चों में,
मैं फिर देखना चाहती हूँ।
अब मैं उम्र के उस मोड़ पर हूँ कि, फिर से एक बच्ची ,
बन जाना चाहती हूँ।
कभी अपनी भावनाओं को,
इन कागजों पर लिखती हूँ।
कभी पति को तो कभी,
बच्चों को सुनाना चाहती हूँ।
कभी वे अपनी व्यस्तता के चलते, सुनने से इंकार करते हैं।
तब उनसे जिद कर जबरदस्ती,
पास उनके मैं बैठ जाती हूँ।
कभी मैं गुनगुनाती हूँ,
कभी पढ़कर सुनाती हूँ।
अब मैं उम्र के उस मोड़ पर हूँ कि, फिर से एक बच्ची बन जाना चाहती हूँ।
मैं ये सब भी समझती हूँ,
उम्र है ये तजुर्बे की।
लोगों को तजुर्बे देती हूँ,
बदले में उनसे भी लेती हूँ।
परिवार की जिम्मेदारियों को,
निभाना कर्तव्य है मेरा।
अपने इस कर्तव्य को निभाते,
बिना जिम्मेदारियों से भागे।
कुछ पल अपने लिए बचाती हूँ।
अब मैं उम्र के उस मोड़ पर हूँ कि, फिर से एक बच्ची बन जाना चाहती हूँ।
कभी हँसती हूँ हंसाती हूँ,
कभी फिर डाँ ट भी खाती हूँ।
कभी कुछ ना पसंद आये,
तो मैं भी डाँ ट देती हूँ।
मुझे क्या अच्छा लगता है,
मुझे क्या रास नहीं आता।
इसका निर्णय अब मैं तो,
बेफिक्र होकर लेना चाहती हूँ।
अब मैं उम्र के उस मोड़ पर हूँ कि, फिर से एक बच्ची बन जाना चाहती हूँ।
गलत से अब भी डरती हूँ,
सत्य से प्यार करती हूँ।
द्वापर की राधा भी मैं तो,
त्रेता की सीता भी मैं ही हूँ।
लेकिन इस कलियुग में अब तो,
लक्ष्मी, दुर्गा और क़ाली
भी मैं ही हूँ।
दुनिया कल क्या कहती थी,
दुनिया आज क्या कहती है।
इन सारी विडंबनाओं सेअब,
मैं ऊपर उठ जाना चाहती हूँ।
अब मैं उम्र के उस मोड़ पर हूँ कि, फिर से एक बच्ची बन जाना चाहती हूँ।
मेरा तो कर्म है गीता,
मेरा तो धर्म है गीता।
अब मैं स्वयं गीता बनकर,
श्री के मद में डूब जाना चाहती हूँ।
क्या लेकर हम आये थे,
क्या लेकर हम जायेंगे।
इस जन्म में किये अपने,
कर्मो की दौलत अब साथ,
लिए मैं जाना चाहती हूँ।
अब मैं उम्र के उस मोड़ पर हूँ कि, मैं फिर से बच्ची बन जाना चाहती हूँ।
रचनाकार- श्रीमती सुनीता बोपचे सिवनी (म प्र)













