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धुंध में घिरा सवेरा

युद्ध की लपटों में घिरा देश का आने वाला कल,
मजहबी धुंध ने भी कर दिया है आसमान धुंधल।
जहाँ उम्मीदों के दीप जलने थे हर आँगन में,
वहाँ नफ़रत का धुआँ अब हर दिशा में पलता है।

मासूम आँखों में सपनों की जगह डर बस गया,
हर दिल में जैसे कोई अनकहा सा खौफ़ हँस गया।
जो हाथ मिलते थे कभी प्यार की मिसाल बनकर,
वो हाथ अब पत्थरों की भाषा में ढलता है।

सरहदों की रेखाएँ दिलों तक खिंचने लगीं,
इंसानियत की आवाज़ भी अब सिमटने लगी।
जो फर्क था बस सोच का, अब जंग बन गया,
हर चेहरा किसी न किसी खेमे में बंटता है।

फिर भी कहीं राख में चिंगारी बाकी है,
इंसानियत की वो आखिरी सवारी बाकी है।
अगर हम चाहें तो ये धुंध भी छंट सकती है,
हर अंधेरे के बाद एक सवेरा पलता है।

जो कल सरहदों पे बिखरते थे मातम के साये,
आज वही शहर और गाँव में भी फैलने लगे हैं।
हर चौखट पर खामोशी का पहरा सा बैठा है,
हँसी के चेहरे भी अब आँसुओं में ढलने लगे हैं।

नफ़रत की आंधियाँ यूँ दिलों को उखाड़ रही हैं,
रिश्तों की जड़ें भी अब धीरे-धीरे टूटने लगे हैं।
जो घर थे कभी मोहब्बत की मिसाल इस ज़मीं पर,
वही अब ख़ुद अपने ही डर से सिमटने लगे हैं।

आर एस लॉस्टम

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