
अस्तित्व पर जब प्रहार हो,
साथ आँसुओं की धार हो,
तब आवाज़ उठाना अधिकार है,
फिर इस पर ना कोई विचार हो।
दिखावे का शहर ऐसा,
जहाँ झूठ का व्यापार हो,
फिर सच वहाँ छिप ही जाता है,
मानो झूठ ही स्वीकार हो।
जो सच कहे वो अकेला है,
जैसे सच कहना बेकार हो,
और झूठ से बिक जाता सब कुछ,
जैसे ये सौदे का बाज़ार हो।
खुद से नज़रें मिला सके,
इतना ज़मीर बरकरार हो,
इंसान इतना भी ना लाचार हो,
कि सच कहने से ही इंकार हो।
मेघा दास
सरायपाली महासमुन्द










