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पहचान

अपनी धरती अपने लोग देश का कैसे उत्थान।
श्रमबल सद् नियत ,सिर उठा खड़े हुए वो शान‌।
परमाणु युद्ध में मिटा सिरमौर वो देश जापान।
पक्के धुन के लिख दें नई इबारत सकल जहान।

धनबल बना सब कुछ, उससे ही बने पहचान।
धरा पर धन बिन नहीं जग में कोई मेहरबान।
धन सहारे ही पूर्व पश्चिम कहलाओ गे इंसान।
नर्ककीट की संज्ञा पाओगे जाओ इंग्लिस्तान।

अपनी धरा पे आज कठिन, नहीं अगर पहचान।
शिक्षा में ऊंचाईयां मुश्किल नहीं यदि धनवान।
युवा मात-पिता को छोड करे दूर देश प्रस्थान।
वक्त पूरा होने पे धकेल दिये जाएं वो हिंदुस्तान।

हर व्यक्ति जूझ रहा मिट न जाए मेरी पहचान।
कुछ वो भी–जो कहे धरा पर बस हम बलवान।
कल बने थे लुटेरे , लूट खाया था सकल जहान।
आज ताकत के बल कहलाएं खूबसूरत इंसान।

है विश्वास एक दिन पांव खडा होगा देश महान।
सात सौ वर्ष गुलामी अवशेष शेष, न हुआ त्राण‌।
मन का दृढ़ निश्चय,वो दिन आएगा चढे परवान।
श्रमबल से व्यवस्था परिवर्तन जिएगा हिंदुस्तान।

                                   महेश शर्मा करनाल

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