
विषय- जब वृक्षों ने कहा मुझसे
विधा- कविता
जब मैं राहों से गुजरती हूँ तो,
इन वृक्षों को देखती हूँ।
जब मैं राहों से गुजरती हूँ तो,
इन वृक्षों को देखती हूँ।
( महसूस कीजिये वे हमसे क्या कहते हैं)
मुझे लगता है……….
मानो वो कह रहे हों,
कुछ देर ठहर जाओ। 2।।
थक गई हो चलते चलते,
कुछ पल यहाँ बिताओ। 2।।
माना कि हम खड़े हैं,
वर्षों से इस जगह पर। 2।।
पर तुम तो आते जाते,
कुछ पल यहाँ बिताओ। 2।।
जब मैंने ठहर के देखा,
तो बेड़ियाँ पड़ी थी।
मानो वृक्ष को जैसे थामे,
मिट्टी वहाँ सुकून से बैठी थी।
डर नहीं था उसे कि कोई,
उसे बहा ले जायेगा।
पेड़ों की जड़ों ने उसे ,
होसला जो दे रखा था।
जब नजरों को मैंने अपनी,
जरा सा किया ऊपर।
उन वृक्षों के माथे को मानो,
किरणें चूमती हों।
इतने प्रेम और विश्वास को लिए,
मानो वे अडिग हैं एक ही जगह पर।
हवा का उनका झोंका,
देता है सबको ठंडक।
मेरी जड़ ,तना, टहनी और
पत्तियाँ ,फूल और फल सब।
आयेंगे काम सबको,
हर पल और हर एक क्षण।
धरती के सभी जीवों की खातिर,
करता हूँ मैं समर्पण।
देता हूँ उन सभी को मैं,
घनी छावं और ठंडक।
तब कहीं मैं समझ पायी,
उन वृक्षों के ह्रदय को।
जिनके फूल मुस्कुराते और,
गिरते फल स्वयं जमीं पर।
धरती के सभी वृक्षों को मेरा,
बार बार वंदन, मेरा बार बार वंदन।
रचनाकार- श्रीमती सुनीता बोपचे सिवनी (म प्र)













