
कला के रंगों में रंगी,
सुंदर भावों में ढली।
हर मुद्रा में एक भाषा,
नृत्य में जीवंत कहानी है।
घुंघरू की छम छम मानों,
नृत्य संग संवाद करे।
हाथों की कोमल मुद्राएं,
भावों का विस्तार करे।
नृत्य की भाव भंगिमाओं में,
जैसे सुंदर राग बहे।
हर थिरकन में जीवन मुस्काए,
मन के सारे द्वार खुले।
जो शब्द न कह पाएं ,
नयन मुद्राएं तब शब्द बनें।
कदमों की सधी चाल,
आत्मा की अभिव्यक्ति बने।
ताल की लय में बंधी धड़कन,
मानों कला की भक्ति करे।
रंग, भाव और राग मिलें यूं ,
ज्यों नृत्य स्वयं ईश्वर से जुड़े।
डॉ. दीप्ति खरे
मंडला(मध्य प्रदेश)













