
जय श्री राम
राम को समझू , राम को गाउँ।
राम बिना मैं, रह ना पाऊँ।
कौन भला इस जग में ऐसा,
आओ गाकर तुम्हें सुनाऊ।
ह्रदय बसे हैं मेरे राम,
था उनको विश्वास अटल।
चीर हृदय जब दिखलाया,
खुल गए सबके नयन पटल।
क्या ये नैनो का धोख़ा है,
या ये भक्त अनोखा है।
हनुमान कह गये प्रभु से…
प्राण त्याग दूँ इसी वक़्त मैं,
यदि तुम्हें मैं ह्रदय न पाऊ।
राम को समझू, राम को गाऊं,
राम बिना मैं रह न पाऊ।
प्रभु मुझसे तुम यदि प्रसन्न हो,
मुझको चरणों के पास रखो।
अब हनुमान कह रहे सिया से…
माँ थोड़े से सिंदूर से,
यदि होते हैं मेरे प्रभु प्रसन्न।
मैं तो लगा सिंदूर नहाउं,
प्रभु को अपने प्रसन्न कर पाऊं।
प्रभु के सिवा नहीं कोई दूजा,
माँ मैं बस करू राम की पूजा।
जैसे प्रभु बसे ह्रदय में मेरे,
मैं भी प्रभु ह्रदय बस जाऊँ।
चिरंजीव में एक हैं,
अपने श्री हनुमान।
रहा नहीं जिन्हें कभी,
निज शक्ति अभिमान।
हर पल जो आतुर रहे,
करने प्रभु का काज।
लांघ समुद्र पहुँच गए,
वो तो रावण के राज।
काज शुरू करने से पहले,
कहते जय श्री राम।
शक्ति का नहीं भान था,
करते सारे काज।
याद दिलाते जब प्रभु,
तुम हो वीर महान।
तुमसा कोई भक्त नहीं,
होगा अब हनुमान।
कलयुग में भक्तों को,
तुम्हीं लगाना पार।
हनुमान तब प्रभु से बोले,
प्रभु तुम हो करुणा निधान।
जो भी लेगा नाम आपका,
सदा रहूँगा उसके साथ।
मैं तो प्रभु चरणों का दास।
तुम बिन स्वयं को व्यर्थ मैं पाऊँ।
राम को समझू, राम को पाऊँ।
राम बिना मैं रह ना पाऊँ।
जय श्री राम
राम राम राम राम राम राम राम
रचनाकार- श्रीमती सुनीता बोपचे सिवनी ( म प्र)













