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बुजुर्गों का सम्मान

बुजुर्ग सनातन की धड़कन, सभ्यता की मूल मिजाज हैं,
इनका सम्मान करना ही, धर्म की असली रीत-रिवाज़ हैं|

कितने अरमान गले लगाकर, खुद को मिट्टी कर दिया,
हम बच्चों के सपनों को, अपने खून से सींच दिया |

आँखों में सावन भरकर भी, होंठों पर धूप खिलाए,
अपनी हर इक साँस देकर, हमको इंसान बनाए |

पर हमने क्या दिया उनको? बस तन्हाई का शाप दिया,
वृद्धाश्रम की राह दिखाकर, उनका स्वाभिमान नाप दिया |

सोचो जिस दिन हर आँगन में, बुजुर्गों का मान होगा,
उस दिन वृद्धाश्रम सूने होंगे, अपराध भी बेजान होगा |

बुजुर्गों की लाठी न काँपे, उनका आशीष न डोले,
जब हर बहू बेटी बनकर, ससुराल में प्रेम घोले |

जैसे मायके में माँ-बाप को, पलकों पर बिठाती बेटी,
वैसे ही सास-ससुर को दे, सम्मान की पूरी रोटी |

तो मिट जाएगा ये कलंक, लिखा जाएगा नया इतिहास,
हर घर में राम-राज्य होगा, लौटेगा संस्कार-वास |

बुजुर्ग कोई बोझ नहीं,घर का चलता-फिरता तीर्थ हैं,
इनके चरणों में झुक जाना ही, सबसे पावन कीर्त है |

राजेश्वरी बाजपेई
जबलपुर मध्य प्रदेश

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