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मजदूर दिवस विशेष

दो रोटी की जंग में क्या कुछ नहीं करता है इंसान
सुबह से शाम तक कोल्हू के जैसे पिसता है इंसान

ना सिर पर से छत बारिश में टपकता पानी उसके
तिरपाल की चादर से खुद को छुपाता है इंसान

चूल्हा घर का जलेगा या बिन जले रह जायेगा
खाली हाथ जाएं घर कैसे यही सोचता है इंसान

ज्यादा की चाह नहीं उसे बस रात की फ़िक्र सताती है
दो पैसे के लिए मजबूरी में मजदूर बनता है इंसान

कुछ पाने की ख्वाहिश ने गांव से शहर में आया है
पेट की आग में देखो बोझा ढो मजदूर कहाता है इंसान

प्रिया काम्बोज प्रिया सहारनपुर उत्तर प्रदेश

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