
माँ की ममता न्यारी है,
वो खुशियाँँ देती सारी है ।
हम सबकी वो दुलारी हैं।
हमारी प्यारी वो फुलवारी है।।
उठना बैठना हमे सिखाती,
खाना पीना भी सिखलाती।
अंगुली पकड़ चलना सिखाती,
पा पा हमे बोलना सिखलाती।।
माँ खुद गिले में सो जाती हैं,
पर हमको सूखे में सुलाती हैं।
आधी रोटी खिलाकर हमको,
माँ स्वयं भूखी ही सो जाती है।।
वो पढी लिखी नहीं है फिर भी,
पढाई का महत्व खुब समझती है।
अपना खुन पसीना बहाकर भी,
दो आखर हमको सिखलाती है।।
माँ जीवन की पहली गुरू हैं,
मातृ भाषा हमको सिखाती हैं।
बाधाओं से यूं लड़ना सिखलाती
संस्कारो का हमको पाठ पढाती।।
जब भी कोई बाधा आती,
चट्टान बन खड़ी हो जाती है।
हमारे सपनो को पुरा करती,
मन्नू आँगन को रोज सजाती है।।
माँ सागर को मसि करू मै,
कागद करू पावन धरा को।
तेरी गाथा लिखी ना जाए,
माँ मेरी दुनियां तेरे आँचल में।।
मुन्ना राम मेघवाल।।
कोलिया,डीडवाना,राजस्थान।












