
मैं उसके चेहरे पर, इश्क का तहरीर देखता हूं
मैं हर रोज चांद में, उसकी तस्वीर देखता हूं।
उसकी मासूमियत उसकी हया क्या
उसकी जज्बात के कहने ही क्या
इस प्रेम कहानी में, मैं रांझा उसे हीर देखता हूं
मैं हर रोज चांद में, उसकी तस्वीर देखता हूं।
जुल्फें झटकाये तो, बादलों की शामत आ जाए
क्या मजाल की उसके रहते, मुझे कोई जहमत आ जाए
मोतियों की लड़ी में भी, उसकी अश्कों की जंजीर देखता हूं
मैं हर रोज चांद में, उसकी तस्वीर देखता हूं।
जब तलक वो मिली न थी, एक अधूरा अफसाना था
मैं अहमक अकेला भीड़ में, उसने ही मुझे पहचाना था
अब मैं उसकी आंखों में, अपनी तकदीर देखता हूं
मैं हर रोज चांद में, उसकी तस्वीर देखता हूं।
सफ़र में वो हमसफर हो, भले ही कांटों भरी डगर हो
चलते रहें हम संग संग, सारी दुनिया से बेखबर हो
उसकी हर एक जिक्र में, मैं अपनी जमीर देखता हूं
मैं हर रोज चांद में, उसकी तस्वीर देखता हूं।
रवि भूषण वर्मा












