
झूठ कहूँ तो सच बुरा मान जायेगा
सच कहूँ तो ज़माना रूठ जायेगा
झूठ को मनाऊँ तो बेईमान हो जाऊंगा
सच का साथ दूँ तो बेगाना अपनों से हो जाऊंगा
ज़िंदगी का येही इम्तीहान है
कलयुग की एक पहचान है
सच सुनना बोला नही जाता
कड़वे जहर से फरेब का मीठा ही मन को भाता
सपनो की दुनियाँ भी सपनों मे ही आती है
जागने से ज्यादा ही वजह नींद सुहाती है
जीवन भ्रम का सागर है भ्रम ही जीने का आधार है
हकीकत ना आये सामने रब के वास्ते ये बेकार है
कड़वा घूंट है जीवन है पीना है
मौत तो रूठा सनम है बिन उसके ही जीना है
किसके हिस्से कितना गम है सच से रूबरू अब होना नही
सहना नसीब बना लिया ओर कुछ अब कहना नही
येही जीवन है ये ही सच का हिसाब है
सुकून मिथ्या है तलाश ही इसका जवाब है
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र












