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“माँ’ के लिए क्या लिखूँ मैं, माँ की ही तो लिखावट हूँ मैं…!”

माँ के लिए क्या लिखूँ मैं, माँ की ही तो लिखावट हूँ मैं,
उसके हर अक्षर की छाया, जीवन की पहली आहट हूँ मैं।

उसकी गोद में पला बचपन, सपनों का मधुर नगर था,
उसकी ममता की छाया में, हर पीड़ा से राहत हूँ मैं।

जब-जब ठोकर खाई मैंने, माँ ने हाथ थाम लिया,
उसके दृढ़ विश्वास से ही, साहस की इबारत हूँ मैं।

उसकी बोली में सरगम है, हर शब्द अमृत बन जाता,
उसकी वाणी के सुरों में, मन का मधुर संगीत हूँ मैं।

रात अँधेरी जब होती है, माँ दीपक बन जलती है,
उसके उजियारे से ही तो, हर राह की रौशनी हूँ मैं।

माँ त्याग तपस्या की मूर्ति, स्नेह सुधा की गागर है,
उसकी हर छोटी सीखों का, जीवन में संचित फल हूँ मैं।

आँचल में उसके जन्नत है, ममता का अथाह सागर,
उसकी पावन छाया में ही, हर दुख से राहत हूँ मैं।

माँ के चरणों में है पूजा, उसका रूप ही मंदिर है,
उसकी भक्ति के भावों से, जीवन की आराधना हूँ मैं।

शब्द सभी छोटे पड़ते हैं, माँ का गुणगान लिखने में,
उसकी ही मूरत का अंश हूँ, उसकी ही पहचान हूँ मैं।

स्वरचित
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार

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