
हौसले और हिम्मत का पाठ पढ़ाते
ये गर्मी से बेहाल, बेजुबान परिंदे ।
विचरते दाना-पानी के लिए यहां वहां
संघर्ष की यह नई कहानी गढ़ते ।
मोहताज रहना नहीं सिखाते यह
ना ही मेहरबानी पर आश्रित।
बस व्याकुल थोड़े प्यास और तपन से
समस्या खड़ी है जो मानव निर्मित।
कहां दिखती अब तरु शाखाएं
कहां है पोखर और तालाब ।
घुसपैठ कर रहा हर जगह इंसान
यह परिंदे किस,किससे मांगे हिसाब।
जागो !अब थोड़ा इंसानी धर्म निभाएं
दाना-पानी देकर इनको अपनाएं ।
प्राकृतिक संतुलन से ही धरती निखरती
दया-धर्म से कार्य में बरकत मिलती।
उर्मिला ढौंडियाल ‘उर्मि’
देहरादून (उत्तराखंड)












