किसी घर का वो प्यारा और लाडला चिराग था,
सपनों से महकता उसका अपना एक बाग था।
पर कद बढ़ाने की एक नासमझ सी चाह ने,
भटका दिया उसे ऑनलाइन विज्ञापनों की राह ने।
चुपके-चुपके वो ज़हर का प्याला पीता रहा,
अपनी ही मौत का अनजाना ताना-बाना सीता रहा।
माँ-बाप को भनक न लगी आने वाले तूफान की,
भेंट चढ़ गया वो लड़का उस घातक सामान की।
अचानक शरीर का साथ धीरे-धीरे टूटने लगा,
हाथों से जीवन का कीमती दामन छूटने लगा।
हीमोग्लोबिन गिरा और अस्पताल का पहरा हुआ,
मासूमियत पर चोट का घाव बहुत गहरा हुआ।
लाखों लुटाए परिवार ने, दुआओं के दौर चले,
अजनबियों के खून से उम्मीद के कई दीप जले।
एक महीने तक मौत से वो जंग लड़ता रहा,
पर नियति का क्रूर साया उस पर पड़ता रहा।
अंत में बुझ गया वो चिराग, सूना हुआ आँगन,
आज मानवता को पुकार रहा है उसका बचपन।
रक्तदान कर किसी का बुझता घर बचा लेना,
इंसानियत का धर्म तुम पूरी निष्ठा से निभा लेना।
कवयित्री ज्योति वर्णवाल
नवादा (बिहार)












