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परीक्षा परिणाम और जिंदगी

      मानव का यह जीवन जिसे ईश्वर ने सृष्ट किया है , यह जीवन बुद्धिजीवी, सुसभ्य और कर्मनिष्ठ होता है , वहीं यह जीवन चुनौती भरा एवं अति संघर्षशील भी होता है ।
    यह सत्य है कि ईश्वर मानव को जो यह जीवन प्रदान करते हैं , उसका बहुत कुछ उद्देश्य होता है जिस उद्देश्य की पूर्ति इस जीवन काल अर्थात् वृद्धावस्था आने के पहले कर लेना अनिवार्य होता है ।
      मानव का यह जीवन सुखद नहीं होता , किंतु इसे सुखद बनाना होता है । यह जीवन आजीवन संघर्षों एवं चुनौतियों से भरा होता है । जीवन मार्ग में पग पग पर काॅंटे बिखरे पड़े होते हैं , जिससे मानव को बचकर चलना ही नहीं होता है , बल्कि मार्ग से काॅंटों को चुनकर हटाना भी होता है ताकि मेरे बाद आनेवले पथिक को वह परेशानी न हो , जो मुझे झेलना पड़ा है ।
       इसके बावजूद ईश्वर ने सुख और दुःख को भी जीवन में जोड़ा है , जिसमें जीवन काल में ही हमें स्वर्ग और नर्क की अनुभूति होती है और यह साबित भी होता है कि सुख ही स्वर्ग है जो सुख के आनंद में डूब जाने के कारण वह सुख का पल लंबा होते हुए भी महसूस  नहीं हो पाता और सुख के दिन बीत जाते हैं । ठीक उसके विपरीत दुःख की घड़ी अत्यंत दुखद हो जाती है और यह पल छोटा होते हुए भी शीघ्र व्यतीत नहीं हो पाता है । जैसे इंतजार की घडियाॅं जल्द कट नहीं पातीं । 
     मानव का यह जिंदगी पद पल परीक्षा और परिणाम से भरा हुआ होता है । मानव को हर घड़ी परीक्षा देने के लिए तत्पर रहना पड़ता है , भले उसकी तैयारी हो या नहीं हो । तैयारी और परिश्रम के आधार पर ही परीक्षा दी जाती है और उस परीक्षा के आधार पर ही परिणाम मिल पाता है । यदि परिणाम में हमें सफलता मालती है तो पल अत्यंत सुखद लगता है और हम खुशी से गदगद हो उठते हैं । उस समय यह महसूस होता है कि स्वर्ग यदि है तो वह पृथ्वी पर ही है , किंतु यदि परिणाम में असफलता मिलती है , तो वह क्षण अत्यधिक दुखद हो जाता है और जीवन ग्लानि से भर जाता है , तब महसूस होता है कि इससे बड़ा नर्क होता ही नहीं है । मैं कहाॅं से आकर इस नर्क में फॅंस गया ।
      अतः परीक्षा , परिणाम और जिंदगी में बहुत ही गहरा तालमेल होता है , क्योंकि परिश्रम और तैयारी के आधार पर ही हम परीक्षा देते हैं और जैसा परीक्षा हम देते हैं , उसी के आधार पर हमें परिणाम मिलता है और जैसा परिणाम मिलता है , उसके आधार पर ही जिंदगी पर प्रभाव पड़ता है ।

पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।

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