
स्त्री की संवेदना को कमजोरी समझा जाए या भावों का अथाह सागर—यह प्रश्न जितना सरल दिखता है, उतना ही गहरा है।
एक ओर समाज एक ऐसी स्त्री की कल्पना नहीं कर पाता जो भावनाशून्य हो, वहीं दूसरी ओर उसी की नैसर्गिक संवेदनाओं को उसकी सबसे बड़ी कमजोरी सिद्ध करने में लगा रहता है। यह विरोधाभास ही स्त्री के भीतर एक निरंतर द्वंद्व को जन्म देता है।
इस द्वंद्व से जूझती हुई स्त्री कभी कठोरता का आवरण ओढ़कर अपनी भावनाओं का गला घोंट देती है, तो कभी उन्हीं भावनाओं को अपना संबल बनाकर जीवन के संघर्षों से जूझती है। वह टूटती नहीं—अपने भीतर ही सहारा ढूँढ लेती है।
पर प्रश्न आज भी वहीं खड़ा है—
आखिर यह समाज, जो स्वयं को प्रगतिशील कहता है, स्त्री की संवेदना को उसकी शक्ति के रूप में क्यों नहीं देख पाता?
सत्य यह है कि स्त्री की संवेदनशीलता उसे कमजोर नहीं बनाती, बल्कि उसे दूसरों के दर्द को समझने, रिश्तों को सहेजने और विपरीत परिस्थितियों में भी खड़े रहने की क्षमता देती है।
“संवेदना, दरअसल, साहस का ही एक रूप है।”
ऋचा चंद्राकर












