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जागो तो सवेरा सो गए तो अंधेरा।


डाक्टर दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक
समन्वयक।आदर्श संस्कार शाला,भारत
आप देश के चर्चित लेखक,सहित्यकार, मोटिवेशनल स्पीकर,ट्रेनर,सामजिक कार्यकर्ता है

केवल कहावत नहीं, जीवन का सबसे सीधा गणित है। जागना मतलब आंख खोलना भर नहीं होता। जागना मतलब जिम्मेदारी को पहचानना, समय की कीमत समझना, और जो हाथ में है उसी से शुरू कर देना। जो व्यक्ति उठ खड़ा होता है उसके लिए हर सुबह नई संभावनाओं का दरवाजा खोलती है। जो टाल देता है, सोता रहता है, उसके लिए वक्त का पहिया वहीं रुक जाता है और फिर अंधेरा धीरे धीरे आदत बन जाता है।

सवेरा अपने आप नहीं होता। सूरज रोज निकलता है पर सवेरा उसी के लिए होता है जो उसे देखने को तैयार हो। बिस्तर में पड़े रहने से दिन निकल जाता है और शाम को लगता है कि कुछ किया ही नहीं। यही अंधेरा है। अंधेरा सिर्फ रोशनी की गैरहाजिरी नहीं है। अंधेरा है मौकों का चूक जाना, हौसले का ठंडा पड़ जाना, खुद से किया वादा तोड़ देना। एक दिन सोने से कुछ नहीं बिगड़ता, पर सोना जब स्वभाव बन जाए तो साल बिगड़ते हैं। फिर आदमी कहता है किस्मत खराब है, जबकि असल में वह खुद हर सुबह किस्मत को दरवाजे से लौटा देता है।

जागने वाले को दुनिया अलग दिखती है। सुबह की शांति में विचार साफ होते हैं। शरीर में ऊर्जा होती है। जो काम दिन भर में चार घंटे लेता, वह सुबह एक घंटे में हो जाता है। कारण सीधा है। दिमाग तब ताजा होता है, फोन शांत होते हैं, लोग डिस्टर्ब नहीं करते। जो छात्र सुबह उठकर पढ़ता है, उसे वही पाठ आसान लगता है जो रात को बोझ लगता था। जो व्यापारी सुबह हिसाब देख लेता है, उसका दिन में फैसला तेज होता है। जो लेखक सुबह लिखता है, उसके शब्दों में रवानी होती है। सवेरा सिर्फ समय नहीं, अवस्था है।

सोने का मतलब केवल नींद नहीं। सोना है टालना। कल करेंगे, बाद में देखेंगे, अभी मूड नहीं है, ये सब नींद के ही रूप हैं। एक बार टालने की आदत लग जाए तो छोटे काम पहाड़ बन जाते हैं। फॉर्म भरना था, नहीं भरा। अब आखिरी तारीख निकल गई। सेहत के लिए चलना था, नहीं चले। अब डॉक्टर की पर्ची लंबी हो गई। किताब लिखनी थी, नहीं लिखी। अब लगता है अब उम्र कहां। अंधेरा इसी तरह बढ़ता है। एक एक बहाना मिलकर पूरी जिंदगी को ढक देता है।

तटस्थ होकर देखें तो समय किसी का पक्ष नहीं लेता। वह अमीर गरीब, शहर गांव, पढ़े अनपढ़ का भेद नहीं करता। सबको चौबीस घंटे मिलते हैं। अंतर केवल इतना है कि कोई उन्हें इस्तेमाल कर लेता है, कोई गंवा देता है। जो जागता है वह शिकायत कम करता है और समाधान ज्यादा खोजता है। जो सोता है वह हालात को दोष देता है। तथ्य यह है कि हालात बदलते हैं कर्म से, नींद से नहीं। नवाचारी सोच वहीं जन्म लेती है जहां व्यक्ति जागा हुआ हो। समस्या को देखकर आंख बंद कर लेना आसान है। आंख खोलकर उसके आर पार देखना, नया रास्ता बनाना, यही नवाचार है।

विश्लेषण करें तो जागने के तीन स्तर हैं। पहला है शरीर का जागना। समय पर उठ जाना, बिस्तर छोड़ देना। यह सबसे आसान है और सबसे ज्यादा टाला जाता है। दूसरा है मन का जागना। लक्ष्य याद रखना, भटकाव पहचानना, खुद को बार बार उसी रास्ते पर लाना। तीसरा है चेतना का जागना। यह समझना कि मैं क्यों कर रहा हूं, किसके लिए कर रहा हूं, इसका असर क्या होगा। जब तीनों स्तर पर जागृति आ जाए तो व्यक्ति सहज हो जाता है। उसे जबरदस्ती करनी नहीं पड़ती। काम अपने आप होने लगता है क्योंकि दिशा साफ होती है।

सरलता ही सबसे बड़ी शक्ति है। लोग अक्सर जागने को जटिल बना देते हैं। पांच बजे उठो, बर्फ के पानी से नहाओ, दस काम करो। फिर दो दिन में थककर छोड़ देते हैं। असल में शुरुआत छोटी होनी चाहिए। आज दस मिनट पहले उठो। कल पंद्रह मिनट। एक गिलास पानी पियो, दो मिनट आंख बंद करके बैठो, एक जरूरी काम लिख लो और उसे कर दो। बस। यह सवेरा है। कलमतोड़ मेहनत की जरूरत नहीं, निरंतरता की जरूरत है। छोटा कदम रोज उठे तो मीलों का सफर कट जाता है।

अदभुत बात यह है कि जागने का असर केवल अपने तक सीमित नहीं रहता। घर में एक व्यक्ति सुबह उठकर काम पर लग जाए तो पूरा माहौल बदल जाता है। बच्चे देखते हैं और सीखते हैं। टीम में एक व्यक्ति समय पर आ जाए तो बाकी लोग भी समय की इज्जत करने लगते हैं। सवेरा फैलता है। वैसे ही अंधेरा भी फैलता है। एक के टालने से दूसरा भी सुस्त हो जाता है। इसलिए जागना व्यक्तिगत नहीं, सामाजिक जिम्मेदारी भी है।

सर्वश्रेष्ठ बनने का कोई शॉर्टकट नहीं है। हर सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के पीछे अनगिनत सुबहें होती हैं जब मन ने कहा सो जा, पर आदमी उठ गया। खिलाड़ी मैदान में सुबह पहुंचता है जब दुनिया सो रही होती है। वैज्ञानिक लैब में तब होता है जब बाकी लोग चाय की बातें कर रहे होते हैं। किसान खेत में तब होता है जब सूरज निकल रहा होता है। सवेरा उन्हें अलग नहीं मिला। उन्होंने सवेरा चुना।

डर भी एक नींद है। लोग असफलता के डर से शुरू ही नहीं करते। सोचते हैं कि लोग क्या कहेंगे। यह सोच अंधेरा है। जागना है तो डर को देखना होगा और फिर भी कदम बढ़ाना होगा। पहली बार में सब लड़खड़ाते हैं। पर जो उठकर फिर चलता है, वही रास्ता बनाता है। गिरना समस्या नहीं, पड़े रहना समस्या है।

तथ्य यह भी है कि हर दिन बराबर नहीं होता। कुछ सुबह थकान वाली होंगी। मन नहीं करेगा। तब भी उठो। क्यों। क्योंकि अनुशासन मूड का मोहताज नहीं होता। मूड बदलता है, पर नियम अगर तय है तो काम होता है। नियम सरल रखो। उठना है, एक काम करना है, सोने से पहले कल का एक काम तय करना है। तीन नियम। इन्हें निभा लो तो अंधेरा पास नहीं आएगा।

जागने का मतलब यह नहीं कि नींद दुश्मन है। नींद जरूरी है। पर नींद समय पर हो, पूरी हो, और उद्देश्य के लिए हो। जो रात को समय पर सोता है वही सुबह समय पर जागता है। जो देर रात तक स्क्रीन में उलझा रहे और सुबह दोष दे कि सवेरा नहीं हुआ, वह खुद अंधेरा चुन रहा है। चुनाव हमेशा हमारे पास है।

जीवन में कई बार लगेगा कि अब तो बहुत देर हो गई। अब क्या सवेरा। तब याद रखना कि जागते ही सवेरा हो जाता है। चाहे उम्र पचास हो या साठ। जिस दिन आदमी तय कर ले कि अब नहीं सोना, उसी पल नया दिन शुरू हो जाता है। किताब उस दिन से लिखी जाती है जिस दिन पहला शब्द लिखा जाए। कारोबार उस दिन से बढ़ता है जिस दिन ग्राहक को पहला फोन किया जाए। सेहत उस दिन से सुधरती है जिस दिन पहला कदम चला जाए।

इसलिए खुद से एक सवाल पूछो। क्या मैं जागा हुआ हूं या सिर्फ आंख खुली है। क्या मेरे फैसले होश में हैं या आदत में। क्या मैं आज का इस्तेमाल कर रहा हूं या कल के भरोसे टाल रहा हूं। जवाब तटस्थ होकर दो। अगर लगे कि नींद ज्यादा है तो अभी उठो। पानी का गिलास पियो। सबसे जरूरी एक काम चुनो। दस मिनट दो। बस शुरू करो। सवेरा इतना ही मांगता है।

अंत में बात सीधी है। जिंदगी रुकती नहीं। समय किसी के लिए ठहरता नहीं। जो इसके साथ चल पड़ा उसके लिए हर मोड़ पर उजाला है। जो रुक गया, लेट गया, उसके लिए वही रास्ता अंधेरा है। जागना कोई बड़ी घटना नहीं है। वह रोज का छोटा निर्णय है। और उन्हीं छोटे निर्णयों से बड़ी जिंदगी बनती है। इसलिए जागो। अभी। क्योंकि जागो तो सवेरा है। सो गए तो सदा अंधेरा है।

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