
हरे पत्ते पर बैठी तितली, रंगों की मुस्कान,
जैसे खुद प्रकृति लिखती हो, ईश्वर का वरदान।
नीले, पीले, लाल पंख में, इंद्रधनुष का वास,
मंद पवन संग झूम रही, लेकर मधुर सुवास।
फूलों की गलियों में जाकर, प्रेम सुधा बरसाए,
निर्मल मन से जो भी देखे, प्रभु निकट वह पाए।
ओस कणों की चूनर ओढ़े, भोर हुई सुकुमार,
धरती के हर कण में दिखता, सृष्टा का आकार।
नन्ही तितली कहती हमसे, जीवन रंग सजाओ,
प्रकृति ईश्वर की वंदना है, मिलकर इसे बचाओ।
कलियों पर जब पाँव धरती, हँस पड़ती हर डाल,
उसके कोमल पंखों जैसे, सपनों का रुमाल।
सूरज की किरणें छूकर, देती नव उल्लास,
मानो प्रभु ने भेजा हो यह, सुंदरता का प्रकाश।
रंगबिरंगी तितली बनकर, संदेश यही सुनाती,
प्रेम, सरलता और हरियाली, जीवन को महकाती।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार












