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विजय और संघर्ष

पलकों में जो स्वप्न रुके हैं, अब उन्हें उजागर करना है,
अम्बर तक उड़ान भरनी है, मुट्ठी में इसे भरना है।
संघर्षों की आँच तपाकर, ख़ुद को कुंदन बनाना है,
हो हवा का रुख़ जैसा भी, हमें आगे बढ़ते जाना है।

डगर-डगर चुनौतियाँ होंगी, नई-नई वारदात होगी,
ऊँची-नीची राहों में, हर मोड़ पर इक मात होगी।
देख गहरी इन घाटियों को, मन को नहीं डिगाना है,
नई उमंग की उड़ानों को, फिर से आज सजाना है।
हो हवा का रुख़ जैसा भी, हमें आगे बढ़ते जाना है…

कंटक-पथ पर चलकर ही, मंज़िल की प्यास बुझानी है,
छूना है तपते आदित्य को, अब मन में ठानी है।
सतरंगी ऊर्जा किरणों को, अपनी बाज़ुओं में भर लेना है,
पंख पसार असीमित अम्बर को, अब हमें छू लेना है।
हो हवा का रुख़ जैसा भी, हमें आगे बढ़ते जाना है…

भँवर अगर आएँगे मुश्किल के, तो उन्हें पार करना है,
लहरों से जो टकराए, उस लहर से आगे बढ़ना है।
पलकों के ठहरे आँसुओं को, अब झटक फेंकना होगा,
अपने ही बाहुबल से अपना, भाग्य नया लिखना होगा।
हो हवा का रुख़ जैसा भी, हमें आगे बढ़ते जाना है…

रख तू भरोसा ख़ुद पर ही, ये दुनिया झुकाने आएगी,
पर अचल खड़ी ये हिम्मत ही, तुझको पार ले जाएगी।
हसरतें चूमती हों आकाश, ऐसा जज़्बा तू पाल ले,
मझधारों का सीना चीरकर, अपनी कश्ती निकाल ले।
हो हवा का रुख़ जैसा भी, हमें आगे बढ़ते जाना है…

सुनहरे पन्नों पर अपना नाम, गौरव से अब लिख देना,
बाज़ सी पैनी नज़र रख तू, लक्ष्य न ओझल होने देना।
‘रजनी’ हर इक कदम पे, अब ख़ुद को आज़माना है,
आसमां को बाहों में भर, एक नया इतिहास बनाना है।

रजनी कुमारी
लखनऊ उत्तर प्रदेश

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