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खुशी

खुशी वो मन का आंंगन है
जो ना सोने के सिक्के, ना ही हीरे जौहरात से मिलती
ना ही बड़ी-बड़ी दुकानों में मिलती है
सच्ची खुशी मिलती है ,तो मां की हाथों की रोटी खाने में मिलती है
बचपन में वो गिल्ली -डंडा खेलना
पापा का कंधे पर बिठाना
घोड़ा बन कर मुझे बिठाकर चलना
दादी-नानी की कहानियों को सुन कर
मिलता है
खुशी ढूंढने से नहीं मिलती है अगर ढूंढोगे तो भटकोगे
खुशी बांटने से ही पाओगे
किसी रोते हुए को चेहरे पर हंसी लाकर देखो
खुशी खुद -ब -खुद तुम्हारे चेहरे पर
नजर आएंगी
तुम खुश हो जाओगे, एक सुकून मिलेगा
कोई पसंदीदा गीत गुनगुनाए
तो बहुत खुशी होती है
दोस्तों के साथ समय बिताने
से भी खुशी मिलती है
ये खुशी बाल में आती है ,पल में जाती है
इसे तुम रोक नहीं सकते हो
खुशी कोई मंजिल नहीं है
ये तो जिंदगी के सफर में
साथ-साथ चलती है
जब तक सांस चल रही है
तब तक समझो की खुशी
का हाथ में हाथ है

डॉ मीना कुमारी परिहार

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