
अहिल्या उद्धार ।।
आश्रम एक दीख मग माही,
खग मृग जीव जंतु तह
नाही।
पूछा मुनिहि सिला प्रभु देखी,
सकल कथा मुनि कहा विसेषी।।
दोहा,,
गौतम नारी शृआप बस,
उपल देह धरि धीर।
चरण कमल रज चाहति,
कृपा करहु रघुवीर। ।
छंद,,
परसद पद पावन सोक
नसावन,
प्रगट भई तप पुंज सही।
देखत रघुनायक जन सुखदायक,
सन्मुख होइ कर जोरी रही।।
अति प्रेम अधीरा पुलक सरीरा,
मुख नहीं आवइ बचन कही।
अतिसय बड़भागी चरनन्हि लागी,
जुगल नयन जल धार बही।।
धीरज मन कीन्हा प्रभु कहुं चीन्हा,
रघुपति कृपा भगति पाई।
अति निरमल बानी अस्तुति ठानी,
ज्ञान गंमय जय रघुराई।।
मैं नारी अ पावन प्रभु जग पावन,
रावन रिपु जन सुखदाई।
राजीव बिलोचन भवभय मोचन,
पाहि पाहि सरनहिं आई।।
मुनि श्राप जो दीन्हा अति
भल कीन्हा,
परम अनुग्रह में माना।
देखेउ भरि लोचन हरि भव मोचन,
इहई लाभ संकर जाना।।
विनती प्रभु मोरी मैं मति भोरी,
नाथ न मागउ बर आना।
पद कमल परागा रस अनुरागा,
मम मन मधुप करै पाना।।
जेही पद सुर सरिता परम
पुनीता,
प्रकट भई सिव सीस धरी।
सोई पद पंकज जेहि पूजत अज,
मम सिर धरेउ कृपालु हरी।
एही भांति सिधारी गौतम नारी,
बार-बार हरी चरन परी।।
जो अति मन भावा सो बरू पावा,
गै पति लोक अनंद भरी।।
राजेंद्र कुमार तिवारी मंदसौर, मध्य प्रदेश












