
कुछ अनकही बातें दर्द देती हैं,
सुबह से शाम ऐसे ही गुजर जाता है।
महफ़िल में ज़रूरी नहीं कि हर कोई मौजूद हो,
पर कुछ खाली जगह यूँ ही खाली रह जाती है।
एक स्थान जो होता है रिक्त का,
वह कभी नहीं भरता,
क्योंकि रिक्त हमेशा रिक्त ही रह जाता है।
भरना होता तो भरकर मिलता,
पर वह नहीं मिलता—
वह खाली ही रह जाता है।
भावुकता वह कड़ी है,
जो भावुक से ही बनती है,
और भावुक बहुत कम होते हैं
जो भावना को समझें।
फिर भावना, भावुकता को
अकेला खड़ा देखती रहती है,
क्योंकि भीड़ कठोर पर्वतों की होती है—
जहाँ झरनों से पानी गिरता है
और समुद्र में जाकर समा जाता है।
पर उस पर्वत पर,
जहाँ से पानी कल-कल बहता है,
वह वहीं ठहर नहीं पाता।
पूरा पर्वत सूखा, वीरान चट्टान-सा
खड़ा देखता रहता है,
भावुक होकर सोचता है—
काश, यह पानी मेरे पास ठहर जाता,
काश, एक बूँद मैं भी पी लेती,
काश, मेरी प्यास बुझ जाती।
काश, यह मेरे तक ठहर जाता,
मैं भी एक बूँद पी लेती,
काश, मेरी प्यास बुझ जाती—
जो एक बूँद के लिए तरस रही है,
काश, वह मेरे पास ठहर जाता।
कोमल होकर, पिघलकर
आँखों से जो आँसू की बूँद निकलती है,
वह भी इस झरने के प्रवाह में
नीचे बह निकलती है।
और झरने को पता ही नहीं होता
कि उसमें एक बूँद उसकी भावुकता की भी है,
जो अपनी ही भावना को ढूँढ़ रही है,
और वह भावना
आँसू बनकर
झरने के पानी में बहती चली जाती है।
उसे क्या पता
कि पर्वत भी रो रहा है
उस एक बूँद के लिए,
जो वहाँ ठहरती नहीं
और बस बहती चली जाती है…
रंजीता भारती श्री
सीतामढ़ी,बिहार












