
आज फिर दिल ने,
पुरानी राहों को पुकारा है।
कॉलेज के उन सुनहरे दिनों का,
आँखों में फिर नज़ारा है।।
वो पहली बार कॉलेज जाना,
अनजाने चेहरों से मिल पाना।
धीरे-धीरे दोस्तों का बन जाना,
और हर दिन हँसते हुए बिताना।।
लड़की होकर लड़कियों को छेड़ना
नटखट होकर उनको रोकना।
हॉस्टल की वो शरारतें
छोटी-छोटी बातों में सौगातें।
टीचरों की डाँट भी प्यारी लगती थी,
दोस्ती में दुनिया बसती थी ।
इम्तिहानों की रातें जागना,
एक-दूसरे को हिम्मत बाँटना।
नंबर कम आए तो भी हँस देना,
और फिर नए सपनों को सजाना।
फिर एक दिन ऐसा भी आया,
सबने बिछड़ने का गीत गाया।
होंठ मुस्कुराए, आँखें नम थीं,
दिल ने हर पल को सीने से लगाया।
अब ना वो गलियाँ हैं,
ना दोस्तों का वही कारवाँ।
पर यादों की महफिल में आज भी,
बसता है मेरा कॉलेज जहाँ।
जब भी पुरानी तस्वीरें देखती हूँ,
दिल थोड़ा बच्चा बन जाता है।
कॉलेज का वो प्यारा ज़माना,
हर याद में फिर मुस्काता है।
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र












