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मुक्तक सृजन

प्रदत्त शब्द –भोर


मात्रा भार -21
भोर बेला में उजियारा छाता है।
नींद से जागा प्राणी मुस्काता है।
ओस की बूँदें मोती-सी दमक रही-
नव जीवन उच्च स्वर गुनगुनाता है।

मात्रा भार -22
रात का पहर धीरे -धीरे हटता है।
सूरज आकर नभ स्वर्णिम पट बुनता है।
हर अँधियारा भागे उजियारे से तब-
भोर का जादू जीवन रंग भरता है।

मंद पवन में फूलों की खुशबू घुलती।
आसमान पर प्रिय स्वर्णिम लाली खिलती।
दिन का स्वागत कर रहे हर एक कण है-
भोर नई आशा जोत जगाती मिलती।

चिड़ियों का मधुर संगीत लहराता है।
नील गगन में नव उजियार फैलता है।
हर पत्ती पर जीवन की लय थिरक उठे—
भोर नया संदेश हृदय में लाता है।


डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार

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