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नीला आसमान

आज फिर दिन बीत गया,
बिना किसी आवाज के, 
दीवारों ने मुझे देखा,
  घड़ी चलती रही,
  पर यह किसी ने नहीं पूछा,
कि-
मैं कैसी हूँ ?
   मैं खिड़की के पास बैठी,
   नीले आसमान को देखती रही,
   जैसे दूर कोई अपना हो,
   जो कभी मिलने नहीं आता।
कितनी अजीब बात है-
भीड़ में तो लोग मिल जाते हैं,

पर अकेलेपन में,
अपना ही साथ नहीं मिलता,
मैंने हाथ बढ़ाया था कभी,
किसी ने थामा नहीं,
मैंने आवाज दी थी कई बार,
पर कोई लौटा ही नहीं !
अब मैं बोलती भी नहीं,
क्योंकि शब्दों का लौट आना,
बहुत दुःख देता है ;
नीला आसमान,
हर रोज मेरे ऊपर से गुजरता है,
पर मेरी देहरी पर,
कभी नहीं उतरता।
शायद–
उसे भी पता है,
कि कुछ घर इतने खाली होते हैं,
जहाँ दस्तक भी रो पड़ती है,
आज फिर शाम हुई है,
और मैं वहीं हूँ–
अपने नाम के साथ,
अपने साये के साथ,
अपने अंतहीन अकेलेपन के साथ ।।

         डॉ. पल्लवी सिंह 'अनुमेहा'
            लेखिका एवं कवयित्री
              बैतूल, मध्यप्रदेश

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