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गाँव का प्रातःकालीन जीवन

भोर हुई, सूरज निकला, फैली सुनहरी लाली,
ओस भरी हर पत्ती लगती, जैसे मोती वाली।

मुर्गे की मधुर बाँग से, जाग उठे सब लोग,
मंदिर से आती घंटियाँ, हर लेती मन-रोग।

गौशाला में गूँज रही, गायों की मीठी धुन,
खेतों की ओर बढ़ चले, किसान लिए श्रम-गुण।

पनघट पर कलश लिए, आतीं गाँव की नार,
हँसी-ठिठोली संग बहता, अपनापन अपार।

ठंडी-ठंडी हवा चले, महके ताज़े फूल,
प्रकृति जैसे खोल रही, सौंदर्य के सब मूल।

चूल्हों से उठता धुआँ, रोटी की खुशबू लाए,
गाँव का प्यारा प्रातःकाल, मन को बहुत भाए।

सरल जीवन, निर्मल मन, प्रेम भरा व्यवहार,
ऐसा सुंदर गाँव लगे, जैसे स्वर्ग-संसार।

डॉ बीएल सैनी
श्रीमाधोपुर सीकर राजस्थान

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