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21 मई 1991 – फेरे अर फेर

रस : हास्य रस + करुण व्यंग्य
छंद : कुंडलिया – 13-11 मात्रा, तुकांत, मालवी छौंक

1
इक्कीस मई ब्याव म्हारो, गाँव में बाजे ढोल,
मैं तो राजी-राजी हँसूँ, लाडू बाँटू खोल-खोल।
लाडू बाँटू खोल-खोल, दिल्ली में बम फूट्यो,
देश को प्रधान स्वर्ग गयो, जग सगलो रूट्यो।
कह ‘विद्रोही’ अजब जोग, विधना ने रच दियो,
मैं हँस्यो ब्याव में, जग रोयो इक्कीस मई को।

2
मंडप में बैठ्यो मैं बणरो, पंडित जी मंत्र उचार,
रामकन्या रोवे हवन कुंड के, लगावे सात फेर बार-बार।
रामकन्या रोवे हवन कुंड के, आँख से आँसू टपके,
उधर रेडियो बोल्यो “राजीव ग्या”, देश को कलेजो धपके।
मैं बोल्यो “रानी मत रो”, पैलां ब्याव निपटार,
मंडप में बैठ्यो मैं बणरो, पंडित जी मंत्र उचार।

3
फोटू खिंचावे चीज़ बोल, दाँत म्हारा चमकाया,
उधर तिरंगा में लिपटी देह, भारत को लाल सुलाया।
भारत को लाल सुलाया, गाँव में बंद बाजार,
मैं बोल्यो “भाया नेग दो”, साला जेब टटोल यार।
एक तरफ शहनाई गूँजे, एक तरफ सायरन घोर,
फोटू खिंचावे चीज़ बोल, दाँत म्हारा चमकाया।

4
रात पड़ी सेज सजाई, इतर-फुलेल लगायो,
रामकन्या बोली “बत्ती बुझाऊँ?”, मैं बोल्यो “उजालो चायो”।
मैं बोल्यो “उजालो चायो”, कर्फ्यू लग्यो शहर में,
एंकर रो-रो हिचकी लेवे, अँधेरो घोर जहर में।
एक तरफ मैं राजा बन्यो, एक तरफ देश कुम्हलायो,
रात पड़ी सेज सजाई, इतर-फुलेल लगायो।

5
भिनसारे पेपर आयो, पानो कारो-कारो देख,
खूँट में छपी खबर म्हारी, “गोपाल ब्यायो” एक रेख।
“गोपाल ब्यायो” एक रेख, रामकन्या ताली बजावे,
बोली “धणी इतिहास में, नाम तुम्हारो आवे”।
मैं बोल्यो “भाग बावली, मातम-ब्याव एक संग देख”,
भिनसारे पेपर आयो, पानो कारो-कारो देख।

6
जब से सालगिरह आवे है, दो रंग संग ले आवे,
सवारे श्रद्धा-सुमन चढ़ाऊँ, साँझे केक कट जावे।
साँझे केक कट जावे, रामकन्या हँस-हँस टोके,
“धणी ब्याव में वो रोती थी, आज तू मेरे चक्कर रोके”।
मैं कहूँ “रानी कर्म का फेर, फेरे में फेर पड़ गयो”,
रामकन्या हवन कुंड रोई, मैं घरवाली के चक्कर रो गयो।

7
गाँव को छोरो चिड़ावे म्हाने, “काका डेट तो फाडू है”,
एक हाथ शहनाई बाजे, एक हाथ में मौन खाड़ू है।
एक हाथ में मौन खाड़ू है, एक आँख हँसे ब्याव पर,
एक आँख से नीर झरूँ, देश के प्रधान के मरण पर।
मैं कहूँ “ऊपर वालो लेखक, कॉमेडी-ट्रेजेडी एक कर दियो”,
रामकन्या हवन कुंड रोई, मैं घरवाली के चक्कर रो दियो।

दोहा
हास्य-व्यंग्य को मेल यो, करुणा से भरपूर।
शहीद को शत-शत नमन, रामकन्या को जरूर।

कवि : गोपाल जाटव ‘विद्रोही’ खड़ावदा
तह. गरोठ, जिला मन्दसौर, मध्यप्रदेश
मालवी माटी को बेटा
सर्वाधिकार सुरक्षित

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