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पवित्र प्रेम

प्रेम की अभिव्यक्ति

प्रेम कोई शब्द नहीं,
जो होठों से कह दिया जाए।
यह तो वो एहसास है,
जो खामोशी में भी सुन लिया जाए।

जब मन की वीणा झंकृत होती,
भावों के दीप जल जाते हैं।
दो नयनों की मौन भाषा में,
प्रेम के फूल खिल जाते हैं।

प्रेम त्याग का सुंदर संगम,
प्रेम आत्मा का संगीत है।
जिसके हृदय में प्रेम बसा,
उसका हरपल मनमीत है।

प्रेम न बंधन न कोई शर्त,
यह तो बस समर्पण होता है।
जब कोई किसी के लिए जिए,
तभी सच्चा प्रेम प्रकट होता है।

प्रेम कभी बारिश बनकर,
सुखी धरती को भिगोता है।
कभी किसी की मीठी यादों में,
मन चुपके – चुपके रोता है।

यह पूजा की थाली है,
जिसमें विश्वास सजाया जाता है।
एक सच्चे मन के स्पर्श से,
जीवन स्वर्ग बनाया जाता है।

प्रेम हृदय में बसता है,
हर ऋतु मधुमास लगती है।
सुखी डाली भी तब जैसे,
प्रेम के फूल लगती है।

प्रेम कभी मीरा की भक्ति,
कभी राधा का श्रृंगार बने।
कभी किसी की मौन प्रार्थना,
तो कभी जीवन का सार बने।

प्रेम में कोई छल नहीं,
न कोई अभिमान रहता है।
सच्चे प्रेम के मंदिर में, बस पावन सम्मान रहता है।

प्रेम करे जो निष्काम भाव से,
उसका जीवन धन्य हो जाए।
एक छोटी सी मुस्कान से भी,
प्रेम में पूरा जीवन बिताए।

अनिता महेश पाणिग्राही
सरायपाली छत्तीसगढ़

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