
हो चुका है शंखनांद रे कान्हा अब तो मेरी बिदाई का,
हंस रहा है कोई रो रहा है गम खा रहा है मेरी जूदाई का,
घर न घर द्वार है कान्हा अपना न कोई परिवार है
दु:ख भरी ये जीवन है अपना बिखरा हुआ संसार है
हंसी के पात्र बन चुका है जीवन कहां रख दूं गठरी बूराई का
हो चुका है शंखनांद रे कान्हा घर से मेरी बिदाई का
आज यहां कल वहां रहूंगा बहता पानी सा कहीं बह जाउंगा
भले भीख मांग कर खाउंगा अपना दु:ख न किसीको बताऊंगा
क्या बीबी क्या बच्चा रे कान्हा सब है अपनी भलाई का
हो चुका है शंखनाद रे कान्हा घर से मेरी बिदाई का
इस चार दिन के जीवन में हजार दिन का झमेला है
लाखों करोड़ों के बीच में हर कोई रहता अकेला है
तुं हीं सच्चा साथी है कान्हा बाकी सब परछाई है
हो चुका है शंखनाद रे कान्हा घर से मेरी बिदाई का
चन्दे पासवान उर्फ अलबेला जी मधुबनी बिहार से,












