
भूलती नही वो शाम की एक बरसात
आमने सामने खड़े हम भीगे साथ साथ
होश ना था खोये थे एक दूजे के दीदार मे
जैसे मन मचल रहा हो तेरे मेरे इन्तज़ार मे
वो पल जहन से अब जाता नही
बरसात का वो मंजर अब आता नही
वो शाम भी अजब सुहानी थी
सिर्फ ओर कुछ नही मेरी उसकी तड़फ की निशानी थी
वो भी क्या बरसात थी आस्माँ से गिरते पानी मे नयनो के अश्क भी शामिल थे
एक अनचाही सी अधूरी प्यास मिलन की जमाने मे नाकाबिल थे
दस्तूर-ए-इश्क था बरबाद होना था
उजड़ा चमन कहाँ आबाद होना था
बचपन का वो प्यार था बचपन मे ही खो गया
याद आ गया गलती से वो प्रेम जख्म और हरा हो गया
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र












