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दीन – हीन

विधा : पद्य
दिनांक : 21 म‌ई , 2026

दीन – हीन बिन दुआ नहीं ,
दया हया बिन नहीं काया ।
दान मान बिन शान कहाॅं ,
खंड पाखंड क्यों दिखावा ।।
तन मन बिन है कर्म कहाॅं ,
कर्म बिन सफल धर्म कहाॅं ।
जो भी होते कर्म से वंचित ,
उनके तन में है शर्म कहाॅं ।।
दीन – हीन दया का है धनी ,
कर्म धर्म शर्म ही पहरेदार ।
इंसानियत चले उनके पीछे ,
आदर प्रतिष्ठा प्रतिष्ठित द्वार ।।
जिनके दिल में प्यार बरसे ,
उनका सुंदर मिले व्यवहार ।
वचन सच्चा औ पिक जैसी ,
जन जन का सुंदर सत्कार ।।
उन्हीं का घर काशी मथुरा ,
उन्हीं का घर काशी हरिद्वार ।
वही हैं मानवता परिचायक ,
जिनके गले दीनता का हार ।।


अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।

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