
जग में चले जीवन– कर्म आधीन
ये भी जरूरी नहीं
सभी सत्य कर्म करेंगे
केवल स्वार्थमय अब सकल संसार
चाहे दूजे डूब मरें
अपनी नैया लग जाए पार ।
वो दुष्कर्म आज घटित हों
जो अन्यों का जीवन
दलदल में दे धकेल … तनिक न लाज ….नहीं परहेज
आज जग अधर्म पूर्ण कृत्यों से
हुआ लबरेज ।
आम जन कशमकश में है
दूजे के स्वारपूर्ण कर्मों की भोग रहा सजा
ये भी भी संभव नहीं — कर्म करें –फल मिले ही मिले
ये जग नियति के आधीन
ये कसूर किस का — किस की ये रजा
निराश हुआ नर — खुद को खुदकुशी दे सजा ।
इस जग में — इस कलिकाल में
भरे पड़े हैं चहूं दिस
अन्य के शुभ कर्म देख
उन के मन पीड़ित
दूजों को उन्नत मार्गं पर चढता देख
बिन श्रम के वो पापबुद्धि से लबरेज़।
बौद्धिकता पर पड़ी डकैती
पाप किये बिन दुष्टों को नींद नहीं आती
बोद्धिक-जगत को
ये मार समझ नहीं आती
मोकापरस्त कल के भविष्य का धन-मन-सपन को
लूट कर बांट रहे कफन ।
उन को तनिक लाज नहीं आती
इच्छापूर्ति हो बस अपनी
अपने स्वार्थ पूर्ण कर्म का चाहें वो गुणगान
वो इस धरा पर
बन बैठे सर्वेसर्वा — जिस से जन-जन परेशान
नर नहीं –वो इस कलिकाल में– जन्में हैं शैतान।
फिर कैस कहें… मेरा देश महान !
महेश शर्मा, करनाल












